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ज्योति पर्व दीपावली

ज्योति पर्व दीपावली
दीपावली सम्पूर्ण विश्व में प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। हमारे देश भारत में चार प्रमुख सामाजिक पर्वों में दीपावली का महत्वपूर्ण स्थान है। यह पर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है, जब घनघोर अंधेरा रहता है। दीपों की माला से इस अंधकार को दूर किया जाता है। इस प्रकार अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व है। इसके साथ कई पौराणिक कहानियां जुड़ी हैं। इनमें सबसे ज्यादा प्रचलित हैं प्रभु श्रीराम का अपनी पत्नी सीता और अनुज ल़क्ष्मण के साथ वनवास की अवधि व्यतीत कर अयोध्या वापस आना। दीपावली से पहले विजय दशमी अर्थात् दशहरे का पर्व मनाया जाता है। दशहरा पर भगवान राम ने राक्षस राज रावण का वध किया था। प्रभु श्रीराम जब १४ वर्ष की वनवास अवधि पूरी कर अयोध्या लौटे तब वहां के निवासियों ने खुशी से पूरे नगर को दीपों से जगमगा दिया था। इसी परम्परा को आज भी त्योहार के रूप में मनाया जाता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। इस समय खरीफ की फसलें तैयार होती हैं। इस खुशी में भी यह पर्व मनाया जाता है। इस बार १४ नवम्बर को दीपावली मनायी जाएगी। कोरोना महामारी के चलते प्रदूषण से बचने का विशेष प्रयास किया जा रहा है, इसलिए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने पटाखों पर प्रतिबंध लगाया है। हम सभी इसका ध्यान रखें। इसके साथ ही इस त्योहार पर जुंआ खेलने जैसी कुरीतियों को भी समाप्त करना होगा। इस त्योहार की मूल भावना को जब हम समझेंगे, तभी हमारी दृढ़ इच्छा का दीपक कुरीतियों के अंधकार को दूर करने में सक्षम होगा। दीपावली का त्योहार पांच दिन मनाया जाता है। दीपावली एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ र्पकाश की पंक्तियाँ होता है। भारतीय कैलेंडर के हिसाब से यह त्यौहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। यह पर्व ज्ञान (र्पकाश) का अज्ञानता (अंधेरे) पर विजयी होने का र्पतीक है।उत्सव के पहले दिन, घरों और व्यावसायिक परिसर को पुनर्निर्मित किया जाता है और सजाया जाता हैं। धन और समृद्धि (लक्ष्मी) की देवी के स्वागत के लिए रंगोली की डिजाइन के सुंदर पारंपरिक रूपांकनों के साथ रंगीन र्पवेश द्वार बनाए जाते है। उसकी लम्बी र्पतीक्षा का आगमन दर्शाने के लिए, घर में चावल के आटे और कुमकुम से छोटे पैरों के निशान बनाएं जाते है। पूरी रात दीपक जलाए जाते है। दीपावली का पर्व धनतेरस से प्रारम्भ होता है। धन त्रयोदशी पर जेवर या बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है इसलिए, महिलाएं कुछ सोने या चांदी या कुछ नए बर्तन खरीदती है और भारत के कुछ भागों में, पशु की भी पूजा की जाती हैं। इस दिन को धन्वन्तरि-(आयुर्वेद के भगवान या देवताओं के चिकित्सक) का जन्मदिन माना जाता है और धन्वन्तरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन पर, मृत्यु के देवता- यम का पूजन करने के लिए सारी रात दीपक जलाएं जाते हैं। इसलिए यह यमदीपदान के रूप में भी जाना जाता है। यह असमय मृत्यु के डर को दूर करने के लिए माना जाता है। दूसरे दिन नर्क चतुर्दशी होती है। इस दिन सुबह जल्दी जागना और सूर्योदय से पहले स्नान करने की एक परंपरा है। कहानी यह है कि दानव राजा नरकासुर- र्पागज्योतीसपुर (नेपाल का एक दक्षिण र्पांत) के शासक- इंर्द देव को हराने के बाद, अदिति (देवताओं कि माँ) के मनमोहक झुमके छीन लेते हैं और अपने अन्त:पुर में देवताओं और संतों की सोलह हजार बेटियों को कैद कर लेते हैं। नर्क चतुर्दशी के अगले दिन, भगवान कृष्ण ने दानव को मार डाला और कैद हुई कन्याओं को मुक्त कराकर, अदिति के कीमती झुमके बरामद किये थे। महिलाओं ने अपने शरीर को सुगंधित तेल से मालिश किया और अपने शरीर से गंदगी को धोने के लिए एक अच्छा स्नान किया। इसलिए, सुबह जल्दी स्नान की यह परंपरा बुराई पर दिव्यता की विजय का र्पतीक है। यह दिन अच्छाई से भरा एक भविष्य की घोषणा का र्पतिनिधित्व करता है। तीसरा दिन समारोह का सबसे महत्वपूर्ण दिन है-लक्ष्मी-गणेश की पूजा। यह वह दिन है जब सूरज अपने दूसरे चरण में र्पवेश करता है। अंधियारी रात होने के बावजूद भी इस दिन को बहुत ही शुभ माना जाता है। छोटे छोटे टिमटिमाते दीपक पूरे घर में र्पज्वलित होने से रात का अभेद्य अंधकार धीरे-धीरे गायब हो जाता है। यह माना जाता है कि लक्ष्मीजी दीपावली की रात को पृथ्वी पर चलती हैं और विपुलता व समृद्धि के लिए आशीर्वाद की वर्षा करती है। इस शाम लोग लक्ष्मी पूजा करते है और घर की बनाई हुई मिठाई सभी को बांटते है। यह बहुत ही शुभ दिन है क्योंकि इसी दिन कई संतों और महान लोगों ने समाधि ली और अपने नश्वर शरीर छोड़ दिया था। महान संतो के ½ृष्टांत में भगवान कृष्ण और भगवान महावीर शामिल हैं। यह वो दिन भी है जब भगवान राम १४ वर्ष के वनवास के बाद माता सीता और लक्ष्मण के साथ घर लौटे थे। इस दिवाली के दिन के बारे में एक बहुत ही दिलचस्प कहानी कठोपनिषद से भी है। एक छोटा सा लड़का था जिसका नाम नचिकेता था। वह मानता था कि मृत्यु के देवता यम, अमावस्या की अंधेरी रात के जैसे रूप में काले हैं लेकिन जब वह व्यक्ति के रूप में यम से मिला, तो वह यम का शांत चेहरा और सम्मानजनक कद देखकर हैरान रह गया। यम ने नचिकेता को समझाया केवल मौत के अंधेरे के माध्यम से गुजरने के बाद व्यक्ति उच्चतम ज्ञान की रोशनी देखता है और उसकी आत्मा, परमात्मा के साथ एक होने के लिए अपने शरीर के बंधन से मुक्त होती हैं। तब नचिकेता को सांसारिक जीवन के महत्व और मृत्यु के महत्व का एहसास हुआ। अपने सभी संदेह को छोडकर, उसने फिर दिवाली के समारोह में हिस्सा लिया।क्रोध, ईर्ष्या या भय - जो भी नकारात्मकता आपके मन में पिछले एक साल में जमा हो गई है, वह सभी जल जानी चाहिए। लेकिन हम क्या करते हैं? नकारात्मकता को मिटाने के बजाय, या तो हम उस व्यक्ति को मिटाना चाहते है या अपने आप को नकारात्मकता की आग में जलाया करते हैं। आपके पास दूसरा रास्ता भी होना चाहिए। सभी नकारात्मकता या बुरी भावनाएं मिटा दें और फिर से उस व्यक्ति के साथ मित्रता बनाए, तब आप र्पेम, शांति और आनंद के साथ हल्कापन महसूस करेंगे। इसके पश्चात् उस व्यक्ति के साथ मिठाई बांटे और दीवाली का जश्न मनाएं। उस व्यक्ति को नहीं लेकिन उस व्यक्ति के अवगुणों का विनाश सही मायने में दिवाली है। यह उत्सव ढलते चाँद के पखवाड़े के १३ दिन से र्पारंभ होता है।यह माना जाता है कि धन (लक्ष्मी देवी) बहुत क्षणिक है और यह केवल वहीं रहती है, जहां कड़ी मेहनत, ईमानदारी और कृतज्ञता हो। श्रीमद भागवत में, एक घटना के बारे में उल्लेख है जब देवी लक्ष्मी ने राजा बली का शरीर छोड़ दिया और भगवान इंर्द के साथ जाना चाहती थी। पूछताछ पर उन्होंने कहा कि वह केवल वहीं रहती है, जहां सत्य, दान, तप, पराक्रम और धर्म हो। इस दिवाली हम सब र्पार्थना करे और आभारी महसूस करें। विश्व के हर कोने में समृद्धि हो और सभी लोग प्यार, खुशी और अपने जीवन में विपुलता का अनुभव करे। विशेष रूप से कोरोना जैसी महामारी का अंत हो जाए।

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