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भूखे-प्यासे मजदूर बोले सिर्फ समझाईश से पेट नहीं भरता साहब

भूखे-प्यासे मजदूर बोले सिर्फ समझाईश से पेट नहीं भरता साहब
आमला। लॉक डाऊन सभी के भले के लिए है। लॉक डाऊन में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। हम सभी को मिलकर कोरोना को हराना है। यह समझाईश हर अधिकारी-कर्मचारी आम जनता को दे रहे हैं लेकिन आमला में गन्ना कटाई करने के लिए महाराष्ट्र से आए करीब 800 परिवारों के सामने फांके मारने की स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे उनका सब्र का बांध अब टूटने लगा है। मजदूरों ने कहा कि भूखे-प्यासे मजदूर बोले सिर्फ समझाईश से पेट नहीं भरता साहब हमारे भोजन की व्यवस्था की जाए। मजदूरी की तलाश में आए थे मजदूर प्राप्त जानकारी के अनुसार मजदूरी की तलाश में, रोजी रोटी की तलाश में अपना परिवार लेकर देढ़ माह पहले आमला ब्लाक में गन्ने की कटाई करने आये लगभग 800 मजदूर लाक-डाउन में आमला में फं स गये। मजदूर मोरखा के समीप स्थित सुगर मिल के लिए गन्ने की कटाई कर रहे थे। मिल मालिक ने भी कोई सूध नहीं ली। सरकार ने भी कोई ध्यान नहीं दिया। प्रशासन ने सिर्फ समझाईश दी, व्यवस्था कुछ नहीं बनायी ऐसे में मजदूरो के सामने खाने के लाले पड़ गए। अब घुघरी बनाने भी नहीं मिल रहे दाने गेंहू की कटाई चल रही थी तो बच्चे गेंहू के दाने बिन-बिनकर अपने तम्बूओ में लाते थे उसकी घूघरी बनाकर मां बच्चो को खिलाती थी लेकिन अब खेतो में गेंहू के दाने भी नहीं मिल रहे है। कभी कभार समाज सेवा का डंका पीटने वाले लोग आते है, किलो-एक किलो अनाज देकर चले जाते है इसमें क्या होता है। इधर प्रशासन भी व्यवस्था बनाने के नाम पर कुछ नहीं कर रहा है। अधिकारी भी आते है, समझाईश देते है, घर के अन्दर रहो, स्वच्छ रहो का पाठ पढ़ा जाते है पर इसके अलावा भी भूखे पेट को कुछ तो लगता है। 800 से अधिक हैं मजदूर आमला ब्लाक में लगभग आमला ब्लाक के अलग-अलग गांवो में डेरा डालकर 800 से अधिक महाराष्ट्र के मजदूर पिछले एक महीने से रह रहे है, वो भी भगवान भरोसे। नन्हे बच्चे भी भूखे और मजदूर भी भूखे। बच्चो के भूखे चेहरे प्रशासन की व्यवस्था की पोल खोल रहे है। ग्राम खापा के समीप लगभग दो से ढाई सौ मजदूर डेरा डालकर रह रहे है। पानी की व्यवस्था तो गांव के किसान कर देते है पर इतने लोगो के लिए खाने की व्यवस्था कौन करे। गन्ने की कटाई के लिए आए थे मजदूरो ने बताया कि गन्ने की कटाई करने होली के पहले आये थे। लाकडाउन के कारण यही फसकर रह गये। मजदूर विजय पाटील ने बताया कि हम सभी महाराष्ट्र के जलगांव जिले के रहने वाले है। प्रशासन जाने की अनुमति नहीं दे रहा है। हमे भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है, खाने के लाले है कोई भी व्यक्ति आता है और सिर्फ समझाईश देकर चला जाता है बड़ी मुश्किल से गुजारा हो पा रहा है, अब तो हम थक गए है, परेशान हो गये है। टूट रहा सब्र का बांध मजदूर अब्बा पाटील ने बताया कि अब तो हमारे सब्र का बांध टूट रहा है, 15 दिन पहले कुछ अधिकारियो ने आकर थोड़ा बहुत अनाज हमे दिया था। इतनी बड़ी संख्या में रूके मजदूरो के लिए वह उंट के मुंह में जीरे जैसा था। उसके बाद किसी ने आकर नहीं देखा। कभी-कभार समाज सेवक आते है और थोड़ा बहुत अनाज के पैकेट देकर चले जाते है। ऐसा कब तक चलेगा। जाने की अनुमति नहीं मिल रही तो कम से कम भरपेट खाना ही मिल जाए। चाचाजी हमें खाना दिला दो ग्राम खापा के समीप मजदूरो के 60 से 70 छोटे बच्चे भी साथ में है। बच्चो से चर्चा की गयी तो उन्होने बताया कि आज खिचड़ी बनी थी। कुछ बच्चो ने बताया कि हमारे घर घुघरी बनी थी। 10 साल के बच्चे मंगेश ने बताया कि चाचाजी हमे खाना चाहिए। भरपेट खाना नहीं मिल रहा है। 5 वर्षीय अर्चना, 8 वर्षीय ऋषभ और 5 वर्षीय साहील ने कहा कि चाचाजी हमें हमारे गांव जाना है हम यहां नही रहना चाहते। यहां खाना नहीं मिलता है। कई गांवो में हंै डेरा गन्ना काटने आए मजदूर सिर्फ खापा के पास नहीं है, ग्राम तोरनवाड़ा, राजेगांव, लालावाड़ी, माहोली आदि गांवो के आसपास भी दूसरे राज्य से आए मजदूरो के डेरे डले हुए है, सबके हाल बेहाल है। प्रशासन के नुमाइंदे बाते बड़ी बड़ी करते है पर इन मजदूरो की व्यवस्था के नाम पर कुछ नहीं है। यही हाल तथाकथित समाज सेवको का भी है। ठीक भी होते है भगवान भरोसे इतनी बड़ी संख्या में मजदूर और बच्चे रहते है तो तबीयत खराब होना भी स्वाभाविक है, बच्चे इस मौसम में अक्सर बीमार पड़ते है, कोई डॉक्टर देखने नहीं आता। जिसका कोई नहीं उसका भगवान होता है। मजदूरो ने बताया कि बच्चो के बीमार होने पर ईलाज के लिए कोई साधन नहीं है भगवान भरोसे बच्चे कुछ समय में खुद ही ठीक हो जाते है। ऐसे में यदि कोई गंभीर बीमार हुआ तो क्या होगा? इनका कहना मजदूरो के लिए व्यवस्था बनायी जा रही है। - नीरज कालमेघ, तहसीलदार, आमला। मेरी जानकारी में है, तहसीलदार से कहा गया है। आज शाम तक मजदूरो के लिए व्यवस्था हो जाएगी। -डॉ. योगेश पंडागरे, विधायक आमला महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा छोटे बच्चो की मदद की जायेगी। -चयेेंन्द्र बुढ़ेकर, परियोजना अधिकारी, आमला मजदूरो के साथ छोटे छोटे बच्चे भी है। प्रशासन मजदूरो के भोजन का इंतजाम करे ऐसी व्यवस्थाएं बनाये जिससे कि गरीब मजदूरो को दोनो टाईम का भोजन मिल सके। -राजेश वट्टी, जनपद सदस्य।

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