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सिर्फ प्रशंसा से ही नहीं भरता है किसी का पेट-त्वरित टिप्पणी-संजय शुक्ला

सिर्फ प्रशंसा से ही नहीं भरता है किसी का पेट-त्वरित टिप्पणी-संजय शुक्ला
देश भर में तेजी से फैल रहे कोरोना वायरस कोविड 19 के संक्रमण की चैन तोडऩे के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए लॉक डाऊन के दौरान देश को संबोधित करते हुए दो मर्तबा डॉक्टर, पत्रकार और पुलिस की प्रशंसा की है। लेकिन सिर्फ प्रशंसा करने से पेट नहीं भरता है। पेट भरने के लिए रोटी की आवश्यकता होती है। वर्तमान में जिस तरह से लॉक डाऊन के 21 दिन करीब आते जा रहे हैं ठीक वैसे-वैसे समाचार पत्रों के दफ्तरों की हालत पतली होती जा रही है। यह इसलिए क्योंकि समूचा बाजार बंद होने से दुकानों-प्रतिष्ठानों पर ताला लटका हुआ है। ऐसे में आय का मुख्य स्त्रोत विज्ञापन ही बंद हो गए है। इस स्थिति में जब आय ही नहीं होगी तो फिर पत्रकारों और अखबार के दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन कहां से मिलेगा? इस विषय में भी प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान और देश के मुखिया नरेंद्र मोदी को भी सोचते हुए राहत पैकेज जारी करने की आवश्यकता है ताकि समाज को जागरूक करने वाले लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के पत्रकार और उसके परिवार को आर्थिक संकट का सामना ना करना पड़े। पत्रकारिता के इतने वर्षों में मैंने यह बहुत ही करीब से देखा है कि यदि किसी के घर की नाली साफ नहीं होती है तो वह नगर पालिका को बाद में और पहले पत्रकार को यह समस्या बताता है क्यों? यदि कोई बीमार हो जाए तो मरीज को अस्पताल के गेट पर पहुंचाते ही सबसे पहले पत्रकार को फोन लगाता है क्यों? यदि किसी के मोहल्ले के विद्युत पोल की स्ट्रीट लाइट बंद है तो सबसे पहले पत्रकार को फोन लगाया जा सकता है क्यों? यदि कहीं ऐसा हो रहा है जो कि नहीं होना चाहिए तो सबसे पहले नागरिकों को पत्रकार ही याद आता है क्यों? जहां भी अन्याय होता है तो वह पुलिस और प्रशासन के पास बाद में जाता है पहले पत्रकार को अपनी समस्या बताता है क्यों? शायद इसलिए क्योंकि हर पीडि़त व्यक्ति को यह पता होता है कि पत्रकार उसकी पीड़ा को ध्यान से सुनेगा और उसकी आवाज बुलंद करने मील का पत्थर साबित होगा। एक पत्रकार भले ही किसी की पीड़ा दूर ना भी कर सकें लेकिन काफी हद तक पीडि़त को राहत प्रदान जरूर कर देता है। पत्रकारिता जनक देवऋषि नारद और पत्रकारिता के पुरोधा श्री हनुमान जी को मानने वाले पत्रकारों से हमेशा समाज की बढ़ चढ़कर अपेक्षा होती है। पत्रकारों के विषय में तो यहां तक हा जाता है कि जहां ना पहुंचे कार वहां पहुंच जाता है पत्रकार....! पत्रकार अगर ना हो तो इस सभ्य समाज के दर्शन किस प्रकार के होंगे यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है कि शक्तिशाली जहां बेकाबू हो जाएगा वहीं दीनहीन और परेशान व्यक्ति पीडि़त बनकर घूमते रहेगा लेकिन उसकी कहीं कोई भी सुनवाई नहीं होगी। मैं तो इस सभ्य समाज से यहां तक यह कहना चाहता हूं कि चंद दिनों के लिए मीडिया और पत्रकार से दूर रहकर जीवन जीने का प्रयास कर देख लीजिए आपको समझ में आ जाएगा कि पत्रकार समाज के लिए कितना और क्यों जरूरी और उपयोगी है। यहां मैं जो कुछ भी लिख रहा हूं उसका उद्देश्य यह कतई नहीं है कि पत्रकार और पत्रकारिता की ढींगे हांकना है बल्कि यह कि समाज और सरकार को एक आईना दिखाने का बरबस ही प्रयास कर रहा हूं ताकि कुंभकर्णी नींद में सो रहे समाज और सरकार के कुछ कत्र्तव्य उन्हें याद आ सकें। आज मैं देखता हूं कि कोरोना वायरस कोविड 19 को लेकर जिले ही नहीं बल्कि समूचे देश भर में लॉक डाऊन किया गया है। डॉक्टरों-पैरामेडिकल स्टाफ को जहां भगवान की संज्ञा दी जा रही है वहीं चौक-चौराहों पर ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों को मसीहा माना जा रहा है कि यदि आज वह सुरक्षित महसूस कर रहे हैं तो इन्हीं पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की वजह से। डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों का गुणगान चहुंओर किया जा रहा है तो मैं यह पूछना चाहता है कि इस विषम परिस्थितियों मीडिया और पत्रकार क्या कर रहे हैं? समाज में इनका कोई योगदान नहीं है? क्या बेवजह पत्रकार रिपोर्टिंग कर रहे हैं? मीडिया संस्थान आय का प्रमुख स्त्रोत विज्ञापन बंद हो जाने के बाद भी यदि समाचार पत्र निकाल रहे हैं तो सिर्फ इसलिए कि लोगों को सही और पुष्टि जानकारी पहुंच सकें क्या यह गलत कर रहे हैं? इलेक्ट्रानिक चैनल दिन-रात सच्चाई से लोगों को अवगत करा रहे हैं कि अफवाह ना फैले तो फिर क्या यह भी गलत कर रहे हैं? अगर नहीं तो फिर पत्रकारों के लिए किसी की हमदर्दी दिखाई क्यों नहीं देती? मैं देखता हूं कि चौक-चौराहों पर मोटी तनख्वाह लेने वाले पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों और डॉक्टर सहित पैरामेडिकल स्टाफ को कहीं भोजन कराया जा रहा है तो कहीं फल वितरित किए जा रहे हैं तो कोई पेय पदार्थ चाय-जूस पिला रहा है। इतना ही नहीं यह सब करते हुए फोटोसेशन के दौरान मास्क भी उतार लिए जाते हैं। ठीक है जाकी जैसी भावना...हमें इससे भी कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यदि अपनी जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग करते हुए इस विषम परिस्थितियों में समाज को अफवाह पर ध्यान ना देते हुए सच्चाई से अवगत कराते हुए सरकार और शासन-प्रशासन की सूचनाओं को जनता तक पहुंचाने में अपना सर्वत्र न्यौछावर कर रहे हैं तो क्या इनके लिए कोई व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? पत्रकारों के आय कितनी होती है इससे सभी वाकिफ रहते हैं ऐसे में अगर जल्द ही पत्रकारों के लिए कोई राहत पैकेज जारी नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब लोगों की खबर बनाने वाला पत्रकार और उसका परिवार आर्थिक तंग से जूझते हुए अंत में खुद एक खबर बन जाएगा और छोटे-मोटे मीडिया संस्थान तो आर्थिक तंगी के चलते प्रकाशन स्थगित करने पर मजबूर हो जाएंगे। देश के प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित करते हुए दो मर्तबा मीडिया और पत्रकारों की प्रशंसा की है लेकिन मैं यहां पर यह कहना चाहता हूं कि सिर्फ प्रशंसा से ही नहीं भरता है किसी का पेट.... दीप जलाए और जरूर जलाएं लेकिन पत्रकार के घर का चूल्हा भी जलता रहे इसका भी देश औ प्रदेश के मुखिया को ध्यान रखते हुए कदम उठाने की आवश्यकता है। जय हिन्द

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